कल रात मैंने एक सपना देखा ,उस सपने में एक मुस्कराहट थी। पर उस मुस्कराहट के पीछे ज़्यादा लोग नही थे वही कुछ गिने चुने मेरे अज़ीज़। आज कल खुश रहने के बहाने धुंडने पड़ते है ,तो सोचा कहि ये किसी और का सपना तो नही तो खुदके चिमटी काटी सपने में ही , हाँ ये तो मेरा ही सपना है ,पर यहा इतनी शांति क्यों है और इतनी शांति में मैं इतना खुश कैसे तो ज़रा ध्यान से देखा और पाया यहा तो मैं कैद हूँ एक बड़ी सी जगह में ,कहि इस बार बीग बोस वालो ने मुझे तो नही चुना अपने घर में रहने को और केवल में ही नही मेरे सारे अज़ीज़ भी तो थे यहा पर , और अचम्बे की तो ये बात थी की कुल 15 और लोग थे मेरे अलावा जिसमे मेरे अम्मा बाबा मम्मी पापा दोनों चाचा दोनों चाची मेरे नालायक 5 भाई बेहेन 1 दोस्त और 1 वो जिसका अब नाम लेने में भी डर सा लगता है हाँ वही मेरा पहला प्यार। खैर ज़्यादा detailing हो गई , अब आप लोग सोचते होंगे की आपको ये क्यों पड़ना चाहिय तो इस पर में कहूंगा अजी बिलकुल ना पढ़िए क्योंकि इस में आपको संतोष मिलेगा जो शायद आपको अच्छा ना लगे आखिर वो लालसा ही तो है जो हमे आगे बढ़ने को प्रेरित करती है , मेरा लक्ष्य आपकी प्रेरणा ख़त्म करना नही है बस आपको ख़ुशी देनी है।
अभी कुछ ही दिन पहले मेरे बाबा गुज़र गए तब मुझे उनकी कमी महसूस हुई जो एक हौसला था उनके होने से इसलिए उनके बिना तो ये सपना अधूरा है।
सबसे रोमांचक बात तो ये थी की इस सपने में कुछ खास नही था वही रोज़ की बाग डोर रोज़ की परेशानियां भी थी पर में परेशान नही था ,पर ऐसा कैसे हो सकता है यह तो में कैद भी हूँ और वही सब कर रहा हूँ जो में बहार असल ज़िन्दगी में करता था ,तब मैंने फर्क जाना ,फर्क मुझमे ना था फर्क था मेरे बाबा की आँखों में जो मुझे बिना हैट उठाए ही शाबाशी दे रही थी फर्क था मेरी अम्मा की बोली में जिसके बोल शान से भरे हुए थे फर्क था मेरे पापा की मुस्कान में जो हर सुबह आशीर्वाद के समान मुझसे टकराती थी फर्क था मेरी माँ के कदमो में जो मुझे सफल पा कर फुले ना समां रहे थे। थोड़ा फर्क मुझमे भी था क्योंकि उसकी उँगलियों में मेरी उँगलियाँ लिपटी हुई थी ......................................
अभी कुछ ही दिन पहले मेरे बाबा गुज़र गए तब मुझे उनकी कमी महसूस हुई जो एक हौसला था उनके होने से इसलिए उनके बिना तो ये सपना अधूरा है।
सबसे रोमांचक बात तो ये थी की इस सपने में कुछ खास नही था वही रोज़ की बाग डोर रोज़ की परेशानियां भी थी पर में परेशान नही था ,पर ऐसा कैसे हो सकता है यह तो में कैद भी हूँ और वही सब कर रहा हूँ जो में बहार असल ज़िन्दगी में करता था ,तब मैंने फर्क जाना ,फर्क मुझमे ना था फर्क था मेरे बाबा की आँखों में जो मुझे बिना हैट उठाए ही शाबाशी दे रही थी फर्क था मेरी अम्मा की बोली में जिसके बोल शान से भरे हुए थे फर्क था मेरे पापा की मुस्कान में जो हर सुबह आशीर्वाद के समान मुझसे टकराती थी फर्क था मेरी माँ के कदमो में जो मुझे सफल पा कर फुले ना समां रहे थे। थोड़ा फर्क मुझमे भी था क्योंकि उसकी उँगलियों में मेरी उँगलियाँ लिपटी हुई थी ......................................
